मन मेरा परिंदा
मन मेरा परिंदा
मन मेरा परिंदा बनकर
उड़ जाता आसमान में
कहीं बैठ जाता पेड़ों और डालो पर
कहीं उड़ता रहता दूर गगन में
इसकी उड़ान बड़ी ऊंची होती
गहरी रहती या मुश्किल होती
पर मैं इसकी तरह हल्की नहीं
विचारों से हूं भरी पड़ी
तो इसके साथ मैं उड़ ना पाती
इसकी गहराई तक पहुंच न पाती
इसे कभी आसानी से समझ लेती हूं
पर दूसरे पल में फिर अनजान हो जाती हूं
इसके अथाह सागर में
डुबकियाँ लगाती रहती हूं
कभी खाली हाथ लौटती हूं
कभी कुछ मोती साथ ले आती हूं
इसकी बसायी दुनिया को
अपना कर इसके साथ चलती हूं
पर यह अगर ठहरा हुआ
तो साथ हो जाती हूं
भागते हुए कभी मैं
इसे पकड़ पाती नहीं
इस परिंदे के लिए कभी कोई पिंजरा मिला नहीं
वरना डाल देती उसको उसमें
सोचती अब सब मेरे वश में है
पर यह परिंदा किसी ने कभी पकड़ा नहीं
इसलिए शायद पिंजरा भी कभी बना नहीं... ...
Super
जवाब देंहटाएंSuperb poem, beautifully written 👌 👏
जवाब देंहटाएंVery nice poem
जवाब देंहटाएंWow superb all poem relate to our situation of heart and mind. Keep writing very well written Varsha
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना हैl
जवाब देंहटाएंToo good
जवाब देंहटाएंVery nice 👍
जवाब देंहटाएंबहुत बधाई. Great 👍
जवाब देंहटाएंबहुत खूब ।
जवाब देंहटाएंबहुत खूब ।
जवाब देंहटाएंBeautifully written 👏, well done Varsha.
जवाब देंहटाएंबहुत खूब । यह poem हम सबकी life से कही न कही relate करती है ।👍
जवाब देंहटाएंAwsome varsha..keep it up.
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