नम आंखें ...... आंसू

भिगो लिया है अपना आंचल    
आद्र हो गया मन आंखें 
बूंदों से जाकर पूछो 
मिल गए उनमें कितने आंसू

सूखे सूखे चले जा रहे थे 
अनजान थे रास्ते और मंजिल  
गीला था मेरा काजल 
नम थी पलके मेरी

बातें होती रहती है 
चलती रहती यह जिंदगी 
जब ना निकले मन की पीड़
 बह जाती नैनों से धारा 

उजाले से भरे दिन 
या हो अंधेरी सी राते   
अश्रु की अठखेलियां सी 
बीते कभी दिन और रातें

बारिशों की रिमझिम बातें
भाती है मेरे मन को 
हल्की सी हो जाती हूं मैं 
जब भीग जाता मेरा मन

बह जाती है पीड़ा मन की 
बूंदों सी निकल जाती है जब 
मिलकर बरसात के खेल में 
छुपा देती हूं मेरे आंसू 

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