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नम आंखें ...... आंसू

भिगो लिया है अपना आंचल     आद्र हो गया मन आंखें  बूंदों से जाकर पूछो  मिल गए उनमें कितने आंसू सूखे सूखे चले जा रहे थे  अनजान थे रास्ते और मंजिल   गीला था मेरा काजल  नम थी पलके मेरी बातें होती रहती है  चलती रहती यह जिंदगी  जब ना निकले मन की पीड़  बह जाती नैनों से धारा  उजाले से भरे दिन  या हो अंधेरी सी राते    अश्रु की अठखेलियां सी  बीते कभी दिन और रातें बारिशों की रिमझिम बातें भाती है मेरे मन को  हल्की सी हो जाती हूं मैं  जब भीग जाता मेरा मन बह जाती है पीड़ा मन की  बूंदों सी निकल जाती है जब  मिलकर बरसात के खेल में  छुपा देती हूं मेरे आंसू 

घर या घोंसला

घोंसला तो बनाने दो उसे तोड़ो तो मत  तिनके तो जमा करने दो  उलझाओ  तो मत जब  तुम  घर बनाते  हो  उसे खूब सजाते हो  मैं ढूंढ ढूंढ  कर लाता  हूँ  हर तिनका चोंच से उठाता हूँ  तुम्हें घर के सामने  समुद्र और हरियाली चाहिए  मैं खोजता रह जाता हूँ  पर हर पेड़ सूखा सा मिलता है  तुम्हें जो जगह पसंद आती है  तुम खरीद  कर घर बनाते हो  हम इस लेन देन  से दूर  हर जगह खुद की समझते है  घोंसला तो  बनाने दो  उसे तोड़ो तो मत  तिनके तो जमा करने दो  उलझाओ  तो मत तुम्हारे घर की हर चीज  बेहद क़ीमती और अनोखी है  मेरे घर की बनावट में  छुपी हुई मेहनत  दिखती नहीं  तुम्हारे बच्चों के पास भी  रहते है कमरे खुद के  मेरा है छोटा सा आशियाना  पर रहती है खुशियां बहुत  दीवारों खिड़कियों से बना  हर घर  तुम्हें है छोटा लगता  रहकर देखो साथ मेरे  घर मुझे मेरा बड़ा लगता  रात को बस सोते उस घर में  रहते तो हर समय बाहर  छोट...