मन की दूरियां
कितनी शक्कर डालू कि मेरी खीर मीठी हो जाए कितना जतन करूं की मन की कड़वाहट दूर हो जाए कितना धीरे चलू की किसी का साथ मिल जाए कितना तेज चलू की किसी का साथ ना छूट जाए मन में जमी हुई रिश्तो की बर्फ को कितना मैं खरोचू कि वह पानी बनकर बह जाए आंखों में बसी धूल को कितना मैं मलू की वह आंसू बनकर आंखों से बह जाए होठों की हंसी को कितनी बार में दिखाऊं कि किसी को यह ना पता चले मेरे दिल की हालत क्या है।