मेरी गर्मी की छुट्टियां
कैसे मेरी गर्मी की छुट्टियां बीत गई और कब मैं बड़ी हो गई कब शादी और बच्चे हो गए कब रिश्तो के बीच में उलझ गई आज कोई छुट्टी मिलती नहीं साल भर गर्मी की छुट्टी पड़ती नहीं छोटे थे तब, बड़े होने का बड़ा शौक था गल्तफहमी का चश्मा चढ़ा हुआ था चश्मा तो जल्दी उतर गया पर बड़े से छोटे होने का रास्ता पता नहीं गर्मी की तपती दोपहरी में कभी इतनी गर्मी लगी नहीं अल्हड़ता में गुम था बचपन मासूमियत का छाता पकड़ रखा था कहां गया वह मेरा छाता अब तक मिला नहीं क्यों इतने समझदार हो गए की गर्मी अब चुभने लगी जल्दी से बड़े होने का चश्मा आंखों पर चढ़ गया दुनिया को ठीक से देखने का झरोखा है बन गया आज चश्मा यह उतरता नहीं आंखों से साफ दिखता नहीं बड़े होने का शौक पूरा हो गया बचपन कहीं मेरा छूट गया क्यों नहीं वह गर्मी की छुट्टियां फिर से आती मेरे उस छाते को ढूंढ कर लाती फिर बड़ी होने का ख्वाब ना सजाती उस बचपन के सुकून में ही रह जाती