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आंखें तो बस आंखें हैं

आंखों की खूबसूरती को क्या बयां करें हाल-ए-दिल बताने का जरिया है आंसुओं की बहती धार की नमी  या गहरे काजल की लकीर  आंखें तो बस आंखें हैं काले भूरे मोतियों सी बड़ी बड़ी पलकों में झुकती सी आंखें  इशारों इशारों में शरमाती सी आंखें  गुस्से में सुर्ख लाल सी आंखें आंखें तो बस आंखें हैं इंतजार में किसी की रुकी सी आंखें  हंसी के साथ कुछ बंद सी आंखें  प्यार में किसी के दीवानी सी आंखें  तकरार में किसी से नाराज सी आंखें  आंखें तो बस आंखें हैं गम में जैसे पानी में भरी आंखें  मस्ती में किसी से उलझी आंखें  ख्वाबों में जैसे खोई सी आंखें  चिंता में जैसे थकी सी आंखें  आंखें तो बस आंखें है शिकायतों में थोड़ी बड़ी सी आंखें  थकान में थोड़ी चढ़ी सी आंखें  सुकून में जैसे शांत सी आंखें  आंखें तो बस आंखें हैं - वर्षा खेमानी (उलझी)

सीधी सी बात

खिड़की से बाहर एक पेड़ था खड़ा आंखों को सुबह-सुबह कर जाता हरा कुछ दिनों से उसके पत्तेपड़ गए पीले समय था या मौसम रंग हो गया फिका जाकर देखा तो गिर गया था हर पत्ता अब हर समय खिड़की लगती बेरंग पर बोल रही थी बातें बड़ी-बड़ी हम सब भी एक पेड़ है हरे भरे रोज गिरते पत्ते हमारे दिन है समय हाथ से निकला जा रहा है पत्ते बचे रह गए कुछ ही झाड़ पर पर जीना सीखा नहीं हमने अभी भी गिरे हुए पत्ते बीते हुए दिन है जुड़ नहीं सकते फिर उस पेड़ से हम भी जी नहीं सकते हमारे पुराने समय को फिर भी जुड़े हुए रहते हैं बचे पत्तों को भी तोड़ रहे है समझ आती नहीं सीधी सी बात पेड़ों ने तो जीना सीख लिया है पर हमें तो सीधी सी बात समझ आती नहीं

घर या मकान

सच्चाई का सच पता चलता नहीं झूठे शब्दों से मन बहलता नहीं कागज से बनी इस दुनिया में नया रंग कोई भरता नहीं पत्थर जमा करके रखें घर मेरा सजा नहीं लोगों की हंसी और बातों बिना बेजान घरों में कोई रहता नहीं फूलों को दिए रंग अलग खुशबू से महक आती नहीं हरे भरे माहौल में भी सुकून की नींद आती नहीं तस्वीरों से भर दिया घर उन बेजान पलों को देखती रही जाने अनजाने में अपनों से बहुत दूर रहने लगी रंग बिरंगी चादरों से हम बिस्तर सजाते रहे और रात भर करवट लेकर लेकर दिन होने का इंतजार करते रहे दुनिया बसाने के लिए मकान तो खरीद लिया बस उसे घर बनाने की झूठी कोशिश करते रहे