संदेश

दिल की हसरत

दरवाजे की ओट से झांका मत करो  तरसती आंखों को  बेक़रार मत करो  तुम चली जाती हो  अपनी आधी अधूरी सी  झलक दिखला कर  छोड़ जाती हो मन को  सपनों में हिचकोले खाते  तुम्हारी उसी झलक को  पूरी करने में लग जाता  कयासों से कोशिश करता  और कभी हार जाता  जब तुम पूरी हो जाती  आंखों में चमक आ जाती  जब ना बना पाता  बेचैनी बढ़ जाती  कोसता, काश फिर देख पाता  पर हिम्मत ना हारता  तुम हर एक रुप में  हर एक अंदाज में  हर एक पल के लिए  हरदम रहती हो खास  दरवाजे की ओट से  झांका तो करो  दिल की हसरतों को  समझा भी करो

मन मेरा परिंदा

मन मेरा  परिंदा मन मेरा परिंदा बनकर  उड़ जाता आसमान में  कहीं बैठ जाता पेड़ों और डालो पर  कहीं उड़ता रहता दूर गगन में  इसकी उड़ान बड़ी ऊंची होती  गहरी रहती या मुश्किल होती   पर मैं इसकी तरह हल्की नहीं  विचारों से हूं भरी पड़ी  तो इसके साथ मैं उड़ ना पाती इसकी गहराई तक पहुंच न पाती  इसे कभी आसानी से समझ लेती हूं  पर दूसरे पल में फिर अनजान हो जाती हूं  इसके अथाह सागर में  डुबकियाँ लगाती रहती हूं  कभी खाली हाथ लौटती हूं  कभी कुछ मोती  साथ ले आती हूं  इसकी बसायी दुनिया को  अपना कर इसके साथ चलती हूं  पर यह अगर ठहरा हुआ  तो साथ हो जाती हूं  भागते हुए कभी मैं   इसे पकड़ पाती नहीं इस परिंदे के लिए कभी कोई पिंजरा मिला नहीं  वरना डाल देती उसको उसमें सोचती अब सब मेरे वश में है  पर यह परिंदा किसी  ने कभी पकड़ा नहीं  इसलिए शायद पिंजरा भी  कभी बना नहीं... ...

नम आंखें ...... आंसू

भिगो लिया है अपना आंचल     आद्र हो गया मन आंखें  बूंदों से जाकर पूछो  मिल गए उनमें कितने आंसू सूखे सूखे चले जा रहे थे  अनजान थे रास्ते और मंजिल   गीला था मेरा काजल  नम थी पलके मेरी बातें होती रहती है  चलती रहती यह जिंदगी  जब ना निकले मन की पीड़  बह जाती नैनों से धारा  उजाले से भरे दिन  या हो अंधेरी सी राते    अश्रु की अठखेलियां सी  बीते कभी दिन और रातें बारिशों की रिमझिम बातें भाती है मेरे मन को  हल्की सी हो जाती हूं मैं  जब भीग जाता मेरा मन बह जाती है पीड़ा मन की  बूंदों सी निकल जाती है जब  मिलकर बरसात के खेल में  छुपा देती हूं मेरे आंसू 

घर या घोंसला

घोंसला तो बनाने दो उसे तोड़ो तो मत  तिनके तो जमा करने दो  उलझाओ  तो मत जब  तुम  घर बनाते  हो  उसे खूब सजाते हो  मैं ढूंढ ढूंढ  कर लाता  हूँ  हर तिनका चोंच से उठाता हूँ  तुम्हें घर के सामने  समुद्र और हरियाली चाहिए  मैं खोजता रह जाता हूँ  पर हर पेड़ सूखा सा मिलता है  तुम्हें जो जगह पसंद आती है  तुम खरीद  कर घर बनाते हो  हम इस लेन देन  से दूर  हर जगह खुद की समझते है  घोंसला तो  बनाने दो  उसे तोड़ो तो मत  तिनके तो जमा करने दो  उलझाओ  तो मत तुम्हारे घर की हर चीज  बेहद क़ीमती और अनोखी है  मेरे घर की बनावट में  छुपी हुई मेहनत  दिखती नहीं  तुम्हारे बच्चों के पास भी  रहते है कमरे खुद के  मेरा है छोटा सा आशियाना  पर रहती है खुशियां बहुत  दीवारों खिड़कियों से बना  हर घर  तुम्हें है छोटा लगता  रहकर देखो साथ मेरे  घर मुझे मेरा बड़ा लगता  रात को बस सोते उस घर में  रहते तो हर समय बाहर  छोट...

मन की दूरियां

कितनी शक्कर डालू कि मेरी खीर मीठी हो जाए कितना जतन करूं की मन की कड़वाहट दूर हो जाए कितना धीरे चलू की किसी का साथ मिल जाए कितना तेज चलू की किसी का साथ ना छूट जाए मन में जमी हुई रिश्तो की बर्फ को कितना मैं खरोचू कि वह पानी बनकर बह जाए आंखों में बसी धूल को कितना मैं मलू की वह आंसू बनकर आंखों से बह जाए होठों की हंसी को कितनी बार में दिखाऊं कि किसी को यह ना पता चले मेरे दिल की हालत क्या है।

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

मेरे बचपन की सोंधी खुशबू,  महका देती आज भी मन जाकर किससे कह दू की  कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन  हर सुबह थी कितनी हल्की आंखे खुलते ही छा जाती मस्ती भाई बहन के साथ बैठकर दूध और बिस्किट के मजे लुटती अपनी बेफिक्री के कारण हम थे खुद के राजा महाराज जब जो करता करने को मन फिर करते हम अपने अंदाज  छोटी सी चवन्नी अठन्नी दिला देती खुशियाँ हजार संतरे पान की गोलियों से जीभ हो जाती नारंगी लाल रविवार का दिन था खास मिल कर टीवी देखते बिज़ली चली जाती जो बीच में हर टोटके अपना लेते नए कपडे दीवाली पर, पुराने कपड़ों में खेलते होली  बडी बहन के छोटे कपडे पहन पा लेते खुशियो की झोली परीक्षा से लगता था डर रिजल्ट के दिन धडकने बढ़ जाती पास होने की खुशियो में मोहल्ले में मिठाइयाँ बंट जाती गरमी की छुट्टियों का अपना एक रहता इंतजार  रेलगाड़ी के सुन्दर सफर से पहुच जाते ननिहाल के द्वार बडे होकर रोब ज़माना चाहते थे मार डांट से बचना चाहते थे बडे हो कर लगता हैं जैसे फिर उस बचपन में लौट जाना चाहते हम काश! कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन  वर्षा खेमानी (उलझी)

मेरी गर्मी की छुट्टियां

कैसे मेरी गर्मी की छुट्टियां बीत गई और कब मैं बड़ी हो गई कब शादी और बच्चे हो गए कब रिश्तो के बीच में उलझ गई आज कोई छुट्टी मिलती नहीं साल भर गर्मी की छुट्टी पड़ती नहीं छोटे थे तब, बड़े होने का बड़ा शौक था  गल्तफहमी का चश्मा चढ़ा हुआ था चश्मा तो जल्दी उतर गया पर बड़े से छोटे होने का रास्ता पता नहीं गर्मी की तपती दोपहरी में कभी इतनी गर्मी लगी नहीं अल्हड़ता में गुम था बचपन मासूमियत का छाता पकड़ रखा था कहां गया वह मेरा छाता अब तक मिला नहीं क्यों इतने समझदार हो गए की गर्मी अब चुभने लगी जल्दी से बड़े होने का चश्मा आंखों पर चढ़ गया दुनिया को ठीक से देखने का झरोखा है बन गया आज चश्मा यह उतरता नहीं आंखों से साफ दिखता नहीं बड़े होने का शौक पूरा हो गया बचपन कहीं मेरा छूट गया क्यों नहीं वह गर्मी की छुट्टियां फिर से आती मेरे उस छाते को ढूंढ कर लाती फिर बड़ी होने का ख्वाब ना सजाती उस बचपन के सुकून में ही रह जाती