कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

मेरे बचपन की सोंधी खुशबू, 
महका देती आज भी मन
जाकर किससे कह दू की 
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन 

हर सुबह थी कितनी हल्की
आंखे खुलते ही छा जाती मस्ती
भाई बहन के साथ बैठकर
दूध और बिस्किट के मजे लुटती

अपनी बेफिक्री के कारण
हम थे खुद के राजा महाराज
जब जो करता करने को मन
फिर करते हम अपने अंदाज 

छोटी सी चवन्नी अठन्नी
दिला देती खुशियाँ हजार
संतरे पान की गोलियों से
जीभ हो जाती नारंगी लाल

रविवार का दिन था खास
मिल कर टीवी देखते
बिज़ली चली जाती जो बीच में
हर टोटके अपना लेते

नए कपडे दीवाली पर,
पुराने कपड़ों में खेलते होली 
बडी बहन के छोटे कपडे पहन
पा लेते खुशियो की झोली

परीक्षा से लगता था डर
रिजल्ट के दिन धडकने बढ़ जाती
पास होने की खुशियो में
मोहल्ले में मिठाइयाँ बंट जाती

गरमी की छुट्टियों का
अपना एक रहता इंतजार 
रेलगाड़ी के सुन्दर सफर से
पहुच जाते ननिहाल के द्वार

बडे होकर रोब ज़माना चाहते थे
मार डांट से बचना चाहते थे
बडे हो कर लगता हैं जैसे
फिर उस बचपन में लौट जाना चाहते हम

काश! कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन 

वर्षा खेमानी (उलझी)

टिप्पणियाँ

  1. बहुत बढ़िया.....बचपन याद आ गया...लेकिन बात वहीं आ जाती है काश....यही जीवन है....जीवन के हर उम्र का लुफ्त उठाओ😊

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर रचना.. पुराने दिनों की याद आ गयी 👏👏

    जवाब देंहटाएं
  3. सुंदर रचना .. पुराने दिनों की याद ताज़ा हो गयी 👏👏

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दिल की हसरत

नम आंखें ...... आंसू