सीधी सी बात

खिड़की से बाहर एक पेड़ था खड़ा
आंखों को सुबह-सुबह कर जाता हरा
कुछ दिनों से उसके पत्तेपड़ गए पीले
समय था या मौसम रंग हो गया फिका
जाकर देखा तो गिर गया था हर पत्ता
अब हर समय खिड़की लगती बेरंग
पर बोल रही थी बातें बड़ी-बड़ी
हम सब भी एक पेड़ है हरे भरे
रोज गिरते पत्ते हमारे दिन है
समय हाथ से निकला जा रहा है
पत्ते बचे रह गए कुछ ही झाड़ पर
पर जीना सीखा नहीं हमने अभी भी
गिरे हुए पत्ते बीते हुए दिन है
जुड़ नहीं सकते फिर उस पेड़ से
हम भी जी नहीं सकते हमारे पुराने समय को
फिर भी जुड़े हुए रहते हैं
बचे पत्तों को भी तोड़ रहे है
समझ आती नहीं सीधी सी बात
पेड़ों ने तो जीना सीख लिया है
पर हमें तो सीधी सी बात समझ आती नहीं



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