घर या मकान

सच्चाई का सच पता चलता नहीं
झूठे शब्दों से मन बहलता नहीं
कागज से बनी इस दुनिया में
नया रंग कोई भरता नहीं
पत्थर जमा करके रखें
घर मेरा सजा नहीं
लोगों की हंसी और बातों बिना
बेजान घरों में कोई रहता नहीं
फूलों को दिए रंग अलग
खुशबू से महक आती नहीं
हरे भरे माहौल में भी
सुकून की नींद आती नहीं
तस्वीरों से भर दिया घर
उन बेजान पलों को देखती रही
जाने अनजाने में अपनों से
बहुत दूर रहने लगी
रंग बिरंगी चादरों से
हम बिस्तर सजाते रहे
और रात भर करवट लेकर लेकर
दिन होने का इंतजार करते रहे
दुनिया बसाने के लिए
मकान तो खरीद लिया
बस उसे घर बनाने की
झूठी कोशिश करते रहे

टिप्पणियाँ

  1. Wow really well written varsha got to see a new side of yours continue to write more all the best

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  2. बेहतरीन रचना ।शब्दों का चयन सराहनीय है।

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  3. Deep thoughts beautifully expressed. Keep it going Varsha!!

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  4. उलझन का वर्णन बहुत ही खूबसूरत है। सच है, पूरी उम्र बीत जाती है, मकान को घर बनाने में।

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  5. जबरदस्त विचार ।बढते रहिए ।

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