चल, आ चले

चल, आ चले 


चल, आ चले
      इस दिनचर्या से दूर
      कही पेड़ की छाँव के नीचे
      चिड़ियों की आवाजों के पास
      ठंडी बायरो की पनाह में
चल, आ चले
      नदियों की कल कल के संगीत में&
      नीले से आसमान की चादर पर
      हरे हरे घास के बिछे बिस्तर
      इस दुनिया के शोर से कही दूर
चल, आ चले
      सालों से चढ़ी थकान को उतारने
      प्रकर्ति की बाँहो में सोने
      अपने अन्तः मन को सुनने
      सुनसान सी उस जगह
चल, आ चले
      उस जगह की सुंदरता आँखों में बसाकर
      मन में अथाह शांति लिए
      होठो पर हल्की  सी गुनगुनाहट लिए
      चल, आ चले  उस दिनचर्या को फिर जीने।

- वर्षा खेमानी (उलझी)

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