जिंदगी की किताब
जिंदगी की किताब
हौले हौले खुलती इन जिंदगी के पन्नों पर
लिखती चली जा रही हूँ मन की कहानी
हर वक़्त उस कलम में स्याही भर्ती रहती हूँ
जो मेरे कोरे पलों में रंग भर जाती है
उठाकर रख दूँ कभी उस किताब को
एक नई किताब से फिर शुरू करना चाहती हूँ
पर इतनी रहस्मय जिंदगी की भागदौड़ में
अब ठहराव की उम्मीद भी नहीं है
वक़्त बिता जा रहा है और
हम भी बढ़ते जा रहे है , पर
आज तक समझ नहीं आया
इस खूबसूरत जिंदगी की सुंदरता कहा चली गयी
पुराना समय अच्छा था
ये बोलने से काम नहीं चलता
क्योंकि मन के किसी कोने में
उन धुंधली यादो की तस्वीरों में ही हम जीते रहते है
काश ! मैं खुद को समझ पाती थोड़ा और
तो जिंदगी के इन उलझे विचार से निकल पाती
- वर्षा खेमानी (उलझी)
बहुत अच्छा शब्दों का चयन।
जवाब देंहटाएंSahi samjhai sabki uljhan
जवाब देंहटाएंBadiya...
जवाब देंहटाएंVery beautiful
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